आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा का महत्व – (Importance of Money in Modern Economy)

मुद्रा के गुण अथवा लाभ निम्नलिखित हैः
1. आधुनिक बाजार-व्यवस्था का आधार (Basis of modern market system) : मुद्रा ही एक ऐसा माध्यम है जिसके कारण बडे़ पैमाने की अर्थव्यवस्था स्थापित हुई है, क्योंकि बड़े कारखानों में जितने माल का उत्पादन होता है वह सभी मुद्रा के बदले तत्काल बिक जाता है तथा प्राप्त हुई मुद्रा से पुनः कच्चा माल खरीदा जाता है तथा उससे नया माल बनया जाता है। इस प्रकार मुद्रा के माध्यम से पूँजी का कई बार आवर्तन किया जा सकता है और अधिक लाभ अर्जित किया जाता है।

2. साख का निर्माण (Creation of Credit) : आधुनिक व्यवस्था का संपूर्ण ढाँचा साख पर आधारित है। बैंकिग संस्थाएँ व्यापार तथा उद्योग केा पूँजी उधार देकर, आर्थिक-तंत्र की जड़ो को हरी-भरी का प्रयत्न करती हैं। अविकासति देशों में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं और मित्र देशों से पूँजी उधार लेकर विकास की गति तीव्र की जाती है। इस संर्पूण साख का आधार मुद्रा है क्योंकि साख की वर्तमान तथा भविष्य की मात्रा का श्रेष्ठतम मान मुद्रा में ही हो सकता है।

3. स्वतंत्र समाज (Free Society) : मुद्रा ने मनुष्य को आर्थिक राजनितिक एवं सामाजिक सवतंत्रता प्रदान की है।

4. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग : मुद्रा के प्रयोग से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को भी प्रोत्साहन मिला है क्योंकि मुद्रा के माध्यम से विभिन्न देशों में पारस्परिक लेन-देन पहले से बहुत अधिक बढ़ गया है। जिससे उनमे राजनीतिक एवं सांस्कृतिक आदान-प्रादान की गति भी तीव्र हो गयी है।

5. पूँजी-निर्माण (Capital Formation) : मुद्रा एक तरल संपति है जिसे बैंक में सुरक्षित जमा के रूप में रखा जा सकता है और ब्याज भी अर्जित किया जा सकता है। बचत की यह धन राशि उद्योगों में विनियोजित कर पूँजी के रूप मे बदली जा सकती है। अतः मुद्रा पूँजी निर्माण में सहायक है।

6. प्रगति की सूचक (Index of Growth) : यदि किसी देश में मुद्रा की कीमत गिरती है तो यह समझना सही होगा कि उस देश की आर्थिक स्थिति अत्यधिक कमजोर है। इसके विपरीत , जिन देशों में मुद्रा का मूल्य स्थिर रहता है, उनकी आर्थिक स्थिति श्रेष्ठ मानी जाती है। श्रेष्ठ अर्थव्यवस्था वाले देशों से निर्यात अधिक होते हैं और उनकी मुद्रा की माँग बनी रहती है, साथ ही उसका मूल्य भी ऊँचा रहता है। इस प्रकार मुद्रा किसी देश की आर्थिक प्रगति की सूचक होती है।

7. पूँजी की गतिशीलता (Mobility of Capital) : मुद्रा बहुत हल्की होने के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरलता से भेजी जा सकती है। मुद्रा के कारण ही पूँजी में गतिशीलता आती है। आजकल बैको के माध्यम से पूँजी का सरलता से स्थानांतरण किया जा सकता है, अन्य वस्तुएँ जैसे मकान, भूमि या अन्य स्थायी संपति को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना संभव नहीं है।

8. पूँजीवाद का आधार (Foundation of Capitalism) : मुद्रा वर्तमान पूँजीवाद अर्थव्यवस्था का आधार है। क्योंकि पूँजीवाद व्यवस्था संगठित की जाती है तथा अत्यधिक बड़े पैमाने पर उत्पादन एवं विक्रय किया जाता है जो मुद्रा के अभाव में संभव नहीं है।

9. सामाजिक कल्याण की सूचक: मुद्रा के माध्यम से ही किसी देश की राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय का माप होता है, अन्यथा विषमता कम हो रही है अथवा बढ़ रही है।

मुद्रा के उपर्युक्त उपयोगों से पता चलता है कि मुद्रा का संपूर्ण राष्ट्रीय जीवन में अत्यधिक महत्व से पता चलता है कि मुद्रा का संपूर्ण राष्ट्रीय जीवन में अत्यधिक महत्व है। मार्शल ने तो यहाँ तक कहा है कि ‘मुद्रा वह धुरी है जिसके चारों तरफ संपूर्ण अर्थ विज्ञान चक्कर लगाता है।

मुद्रा के दोष : यद्यपि सभी प्रकार की अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रा महत्वपूर्ण कार्य करती है फिर भी वह दोषहीन नहीं है। इसके निम्न कारण हो सकते हैं-
1 बाजार अर्थव्यवस्था में मुद्रा की क्रय शक्ति स्थिर न रहने के कारण तेजी व मंदी, स्फीति व अवस्फीति के चक्र चलते ही रहते है। जिससे आय का वितरण विगड़ जाता है इससे समाज के विभिन्न वर्ग प्रभावित होते है। कभी तेजी तथा कभी वस्तुओं की कमी हो जाती है तो कभी मंदी व बेरोजगारी फैल जाती है और सामजिक व्यवस्थाएँ अस्त-व्यस्त होती रहती है।

2 यह आय मे भारी असमानता उत्पन्न करने व बनाए रखने के लिए उतर दायी है इससे समाज धनी व द्ररिद्र दो वगों में बट जाता है तािा अमीरों की संपति व गरीबों का शोषण दोनों ही बढ़ते जाते है।

3 मुद्रा भ्रष्टाचार के फैलने में सहायता करती है, चोरी, तस्करी, रिश्वत खोरी जमाखोरी मुनाफा खोरी व दुराचार आदि मुद्रा की प्राप्ति के लिए ही किये जाते है।

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